****बच्चे पैदा करना चाहिए या नहीं*****
ये मेरा खुद का विचार है आप सहमत या असहमत दोनों हो सकते हैं। आज मैं वैज्ञानिक तरीके से गहराई में जाकर ये जानने की कोशिश करूंगा कि बच्चे पैदा करना सही है या नहीं,मैं पूरी निष्पक्षता से पड़ताल करूंगा क्योंकि मैं कोई भी प्रारंभिक निर्णय निश्चित करके लकीर का फकीर बनना पसंद नहीं करता।हालांकि बच्चे पैदा करना किसी का व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है फिर भी यदि वो कुछ बातें पहले से जानकर ये फैसला ले तो ज्यादा बेहतर होगा।यदि आपने इसे पूरा पढ़ लिया तो फिर इस मुद्दे पर सारी चीजें स्पष्ट हो जायेंगी।ये पोस्ट उनके लिए है जिनके अभी बच्चे नहीं हैं और बच्चा चाहते हैं।जिनके हैं वो दूसरों को सलाह दे सकते हैं क्योंकि अच्छी और जागरूकता वाली बातें सबको जाननी चाहिए।
सबसे पहले तो बच्चे पैदा करने से पहले बेटे,बेटी का भेदभाव दिमाग से निकाल दें; चाहे बेटी हो या बेटा क्या फर्क पड़ता है जब कोई मर जाता है तो उसको ये एहसास नहीं होता है कि कुल का दीपक है या नहीं, वंश चल रहा है या नहीं; रही बात अपना नाम आगे बढ़ाने की तो कुछ ऐसा करिए कि इतिहास के पन्नों में आपका नाम आ जाए।फिर गांव पास पड़ोस और रिश्तेदार ही नहीं पूरा देश आपके नाम को याद करेगा;अपना नाम आगे बढ़ाने के लिए बेटा पैदा करना जरा भी न्यायपूर्ण प्रतीत नहीं होता।
अब रही बात बुढ़ापे की तो इसकी क्या गारंटी है कि बेटा बुढ़ापे में आपका सहारा बनेगा? मेरा ये मानना है कि यदि आपने बुढ़ापे के लिए पहले से तैयारी की है पर्याप्त धन, संपत्ति संचय किया है तो फिर कोई भी आपके बुढ़ापे में सहारा बन जायेगा फिर चाहे वो बेटी हो या फिर पड़ोस, गांव या रिश्तेदार से कोई सदस्य हो।आपका घर, खेत या जमीन है इतना ही काफी है कोई न कोई इसे हासिल करने के चक्कर में बुढ़ापे का सहारा बन जाएगा। मेरा उद्देश्य अपने इस जीवन को आनंद, उल्लासपूर्ण बनाना है मैं अगले जन्म में विश्वास नहीं करता; तो क्यों न ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश की जाये ताकि यह जीवन मजे से गुजरे।
भारत की जनसंख्या इस चक्कर में इतनी बढ़ गयी है कि हो सकता है अगली संतान बेटा हो जाय; एक बेटा पाने की लालच में पांच, छ:,सात बेटियां पैदा कर डालते हैं।ये बात उनके लिए भी है जो एक बेटी पैदा करने के लालच में चार, पांच बेटों को जन्म दे डालते हैं। इससे बड़ी मूर्खता और क्या हो सकती है हैरानी की बात तो ये है कि इस रेस में पढ़े लिखे, अनपढ़ सब शामिल हैं। ये लोग उसी साफ्टवेयर से चलते हैं जो कि समाज ने पहले से दिमाग में भर दिया है। मेरा मानना है कि परिवार,समाज और रिश्तेदारों के दबाव में आकर अपने जीवन का कोई भी फैसला नहीं करना चाहिए। क्योंकि मुसीबत और परेशानी के समय आप खुद ही अपना सहारा बनेंगे को दूसरा नहीं, इसलिए वही किया जाय जो आज भी अच्छा हो और भविष्य के लिए भी अच्छा हो।
जितना खर्च एक इंसान अपने एक बेटी या बेटे को उसके काबिल,स्वावलंबी बनने यानी बीस साल तक करता है। यदि उतना ही पैसे का एफडी करा लिया जाय तो बुढ़ापा बहुत ही आराम और मजे से कटेगा।दरअसल हमारा समाज उसमें रहने वाले लोगों ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है ताकि हर कोई इस मकड़जाल में उलझा रहे,आप ही सोचिए कि जब बच्चा पैदा होता है तो आपरेशन का खर्च नहीं तो नार्मल पैदा हुआ है तो अस्पताल और डाक्टर का खर्च।जान चले जाने का खतरा ऊपर से महिलाएं कितनी तकलीफ से गुजरती हैं इसका अनुमान भी लगा पाना मुश्किल है। अब पैदा हुआ बच्चा बीमार हो जाये तो वहां भी खर्च और सिरदर्द ऊपर से; बच्चा पैदा करने के बाद महिलाओं का पेट लटक जाता है पूरी पर्सनैलिटी खराब हो जाती है यदि आपरेशन हुआ हो तो फिटनेस बर्बाद जिम जाने, कसरत करना बंद करा दिया जाता है भारी वजन उठाने के लिए मना कर दिया जाता है।
बच्चा जैसे ही पैदा होता है अब बीस साल के लिए एक नयी जिम्मेदारी मत्थे मढ़ जाती है। महिलाओं के लिए तीन साल तक तो जेल जैसा माहौल हो जाता है हमेशा दिन रात बच्चे की देखभाल करना करना पड़ता है। कहीं भी चैन से घूम नहीं सकती, पुरूष का क्या उन्हें मन हुआ तो पांच मिनट बच्चे से खेलकर निकल लेते हैं।एक दिन चौबीस घंटे किसी बच्चे को पालकर देखें तब समझ आयेगा कि कितनी तकलीफें उठानी पड़ती है।बच्चा पांच साल का हुआ तो उसकी पढ़ाई, कापी,किताब,खिलौने,साइकिल,कार का नया खर्च आ जाता है। जैसे तैसे वह बड़ा होकर स्कूला लाइफ से कालेज में पहुंचा तो उसको बड़ी पढ़ाई डाक्टरी,इंजीनियरिंग करवाने या फिर सरकारी नौकरी की तैयार का अलग खर्च। यहाँ किसी को पांच, दस या बीस-बीस लाख तक खर्च करना पड़ता है। फिर भी ये गारंटी नहीं है कि इतना करवाने के बाद वो अपने पैर पर खड़ा हो जाय।एक समस्या और मान लीजिए मां बाप में से किसी के साथ दुर्घटना हो जाती है तो बच्चे के लिए नयी मुसीबत,अब उसकी पढ़ाई, लिखाई और देखभाल कौन करेगा?और यदि वो पढ़ेगा नहीं तो फिर पैसे के लिए दर दर ठोकर खायेगा;इतना कष्ट, दुख देने के लिए बच्चा पैदा कर लेना कहां बुद्धमानी है। खासकर हमारे देश भारत में आने वाला समय और मुसीबत भरा होने वाला है,जनसंख्या लगातार बढ़ रही है और संसाधन कम होते जा रहे हैं।
बाबा, दादाओं,पुरूखों, पूर्वजों,समाज,रिश्ते,नातों के दबाव में आकर शादी या बच्चे पैदा करना बिल्कुल भी ठीक नहीं है।ये लोग तो दूसरों की शादी और बच्चे के बहाने भकोसने,और अपना पेट भरने का जुगाड़ खोजते हैं बाकी इन्हें आपसे कोई हमदर्दी नहीं है।वैसे भी हमारे देश की जनसंख्या ऐसे बढ़ रही है कि यदि ऐसे ही बढ़ती रही तो खड़े-खड़े सोने की नौबत न आ जाए; हमें तो इसी बात की चिन्ता है।
इसके बावजूद यदि आप इतने खर्चों और परेशानियों को उठाने के लिए तैयार हैं तो अब आप बच्चे पैदा कर सकते हैं।लेकिन एक ही रहे तो ज्यादा बेहतर है फिर चाहे वो बेटी हो या बेटा क्या फर्क पड़ता है। यदि सभी लोग एक ही बच्चा पैदा करने का संकल्प लें तभी दुनिया की जनसंख्या रूक सकती अन्यथा ऐसे ही बढ़ती रही तो एक दिन यही वो कारण होगा जिसके कारण मानव जाति का अन्त हो जाएगा। इंसान अनाज और पानी के लिए एक दूसरे का जानी दुश्मन हो जाएगा, चारों तरफ घमासान मच जाएगा;बड़े और ताकतवर देश छोटे देशों पर हमला करके उसका अनाज, पानी हथियाने की कोशिश करने लग जायेंगे। इसलिए भलाई इसी में है कि अभी से चेत जाएं अन्यथा बाद में चेतने के बाद तो पछताने का भी मौका नहीं मिलेगा।
एक बात और जिनके बच्चे नहीं हो रहे हैं वो बहुत मजे में हैं उन्हें तो बिल्कुल भी चिन्ता नहीं होना चाहिए।खाएं पीएं और आजाद होकर दुनिया की सैर करें; यदि बहुत ज्यादा शौक है बच्चे का तो अनाथालय से ले लें। क्योंकि अवसर बहुत बढ़िया है उस बच्चे को भी मां बाप मिल जाएंगे।
आप इस विषय में क्या सोचते हैं हमें जरूर बतायें, मेरा उद्देश्य ये है कि कुछ ऐसी व्यवस्था की जाय ताकि मानवजीवन आसान और सुखमय हो सके, इस मुद्दे पर पुरूषों और महिलाओं दोनों को बात करना चाहिए; अब तो आपको समझ आ ही गया होगा कि बच्चा पैदा करना चाहिए या नहीं करना चाहिए।यदि करना चाहिए तो कब करना चाहिए और कितना करना चाहिए~ सौरभ
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